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mahabharat 12.320.131: धर्म, अर्थ और काम की त्रिमूर्ति इसी को कहते हैं। यह सात रूपों में व्यक्त होती है। जो मनुष्य अपने कर्मों में इस त्रिवर्ग को नहीं जानता और जो सदैव त्रिवर्ग से ही संबंधित रहता है, उसमें जीवनमुक्ति का क्या लक्षण है? 131॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  12.320.131 
त्रिवर्गं सप्तधा व्यक्तं यो न वेदेह कर्मसु।
सङ्गवान् यस्त्रिवर्गेण किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम्॥ १३१॥
 
 
अनुवाद
धर्म, अर्थ और काम की त्रिमूर्ति इसी को कहते हैं। यह सात रूपों में व्यक्त होती है। जो मनुष्य अपने कर्मों में इस त्रिवर्ग को नहीं जानता और जो सदैव त्रिवर्ग से ही संबंधित रहता है, उसमें जीवनमुक्ति का क्या लक्षण है? 131॥
 
It is called the trinity of religion, artha and work. It is expressed in seven forms. What is the sign of liberation in life in a person who does not know this trivarga in his actions and who is always related to the trivarga? 131॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)