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mahabharat 12.320.127: जैसे तुम अपने द्वारा अपने अन्दर आत्मा को देखते हो, वैसे ही अपने द्वारा दूसरों में आत्मा को क्यों नहीं देखते ॥127॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  12.320.127 
आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं यथा त्वमनुपश्यसि।
एवमेवात्मनाऽऽत्मानमन्यस्मिन् किं न पश्यसि॥ १२७॥
 
 
अनुवाद
जैसे तुम अपने द्वारा अपने अन्दर आत्मा को देखते हो, वैसे ही अपने द्वारा दूसरों में आत्मा को क्यों नहीं देखते ॥127॥
 
Just as you see the Self in yourself through yourself, why do you not see the Self in others through yourself? ॥127॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)