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mahabharat 12.320.122: उपर्युक्त कलाएँ, जो विविध प्रयोजनों की सिद्धि के लिए समस्त प्राणियों में विद्यमान हैं, प्रतिक्षण अपने स्वरूप में परिवर्तन या विविधताएँ करती रहती हैं; परंतु वह इतनी सूक्ष्म है कि उसका पता नहीं चलता ॥122॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  12.320.122 
कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेद: क्षणे क्षणे।
वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात् तु न विभाव्यते॥ १२२॥
 
 
अनुवाद
उपर्युक्त कलाएँ, जो विविध प्रयोजनों की सिद्धि के लिए समस्त प्राणियों में विद्यमान हैं, प्रतिक्षण अपने स्वरूप में परिवर्तन या विविधताएँ करती रहती हैं; परंतु वह इतनी सूक्ष्म है कि उसका पता नहीं चलता ॥122॥
 
The above mentioned arts, which are present in all living beings for the accomplishment of various purposes, are undergoing changes or variations in their form every moment; but it is so subtle that it cannot be noticed. ॥122॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)