श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  12.320.121 
कौमाराद् यौवनं चापि स्थावीर्यं चापि यौवनात्।
अनेन क्रमयोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते॥ १२१॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वह बाल्यावस्था से युवावस्था और युवावस्था से वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। इस क्रम से क्रमिक अवस्थाओं में पहुँचने पर पूर्वावस्था का स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता।
 
In this manner, from childhood he attains youth and from youth he attains old age. In this order, on reaching successive stages, the form of the previous stage is not seen.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)