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mahabharat 12.320.116: राजेन्द्र! यह अव्यक्त प्रकृति जो सबका उपादान कारण है, ऊपर वर्णित तीस कलाओं के रूप में अभिव्यक्त हुई है। मैं, तुम तथा अन्य समस्त देहधारी प्राणियों के शरीर प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं ॥116॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  12.320.116 
येयं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता।
अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिण:॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! यह अव्यक्त प्रकृति जो सबका उपादान कारण है, ऊपर वर्णित तीस कलाओं के रूप में अभिव्यक्त हुई है। मैं, तुम तथा अन्य समस्त देहधारी प्राणियों के शरीर प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं ॥116॥
 
Rajendra! This unmanifested nature which is the material cause of everything, has attained expression in the form of the thirty arts mentioned above. Me, you and all the other embodied beings, their bodies have originated from nature only. ॥ 116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)