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mahabharat 12.320.115: चाहे वह अव्यक्त हो, व्यक्त हो, दोनों हो अथवा चारों (ब्रह्म, माया, जीव और अविद्या) कारण हों, तत्त्व का विचार करने वाले विद्वान् लोग प्रकृति को ही समस्त भूतों का उपादान कारण मानते हैं ॥115॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  12.320.115 
अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वयीमथ चतुष्टयीम्।
प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तका:॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
चाहे वह अव्यक्त हो, व्यक्त हो, दोनों हो अथवा चारों (ब्रह्म, माया, जीव और अविद्या) कारण हों, तत्त्व का विचार करने वाले विद्वान् लोग प्रकृति को ही समस्त भूतों का उपादान कारण मानते हैं ॥115॥
 
Be it latent, manifest, both or all four (Brahma, Maya, Jiva and Avidya) causes, the scholars who contemplate on the spiritual principle consider nature to be the material cause of all existences. 115॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)