श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  12.320.114 
अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति।
व्यक्तं चासां तथा चान्य: स्थूलदर्शी प्रपश्यति॥ ११४॥
 
 
अनुवाद
कुछ विद्वान् लोग इन तीस कलाओं का उपादान कारण अव्यक्त प्रकृति को मानते हैं। अन्य स्थूल दृष्टि वाले विचारक व्यक्त अर्थात् परमाणुओं को ही कारण मानते हैं और कुछ लोग अव्यक्त और व्यक्त दोनों अर्थात् प्रकृति और परमाणुओं को ही इनका उपादान कारण मानते हैं ॥114॥
 
Some scholars consider the unmanifested nature to be the material cause of these thirty arts. Other gross-sighted thinkers consider the manifested, i.e. atoms, to be the cause and some consider both the unmanifested and the manifested, i.e. nature and atoms, to be their material causes.॥ 114॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)