श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 107-108h
 
 
श्लोक  12.320.107-108h 
अथ पञ्चदशो राजन् गुणस्तत्रापर: स्मृत:।
पृथक्कलासमूहस्य सामग्रॺं तदिहोच्यते॥ १०७॥
गुणस्त्वेवापरस्तत्र संघात इव षोडश:।
 
 
अनुवाद
राजन्! उस अहंकार में कामना नामक एक और गुण माना गया है, जो पंद्रहवाँ है। वहाँ पृथक् कलाओं के समूह की समग्रता ही दूसरा गुण है। संघात की भाँति, उसे यहाँ सोलहवाँ कहा गया है ॥107 1/2॥
 
King! In that ego, another quality called desire is considered, which is the fifteenth. There, the totality of the group of separate arts is another quality. Like Sanghat, it is called the sixteenth here. ॥107 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)