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mahabharat 12.320.106: उस सत्तामें अहंकार नामक एक और चौदहवाँ गुण है जो ‘मैं कर्ता हूँ’ इस अभिमानसे युक्त है, जिसके कारण जीवात्मा ‘यह वस्तु मेरी है और यह वस्तु मेरी नहीं है’ ऐसा मानता है ॥106॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  12.320.106 
अहं कर्तेति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दश:।
ममायमिति येनायं मन्यते न ममेति च॥ १०६॥
 
 
अनुवाद
उस सत्तामें अहंकार नामक एक और चौदहवाँ गुण है जो ‘मैं कर्ता हूँ’ इस अभिमानसे युक्त है, जिसके कारण जीवात्मा ‘यह वस्तु मेरी है और यह वस्तु मेरी नहीं है’ ऐसा मानता है ॥106॥
 
In that entity, there is another fourteenth quality called ego which is accompanied by the pride that 'I am the doer', due to which the soul believes that 'this thing is mine and this thing is not mine'. ॥106॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)