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mahabharat 12.32.24: कुन्तीनन्दन! यदि युद्ध आदि में राग-द्वेष के कारण निन्दित कर्म हुए हों, तो उन कर्मों के प्रायश्चित के लिए शास्त्रों में विधान है। जो अपने शरीर को सुरक्षित रखता है, वह पापों की निवृत्ति के लिए प्रायश्चित कर सकता है; किन्तु जिसका शरीर नहीं रहेगा, वह उन पापकर्मों के फलस्वरूप पराजय ही पाएगा, क्योंकि वह प्रायश्चित नहीं कर सकता। 24॥   |   mahabharat अध्याय 12.32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.32.24 
विहितानि हि कौन्तेय प्रायश्चित्तानि कर्मणाम्।
शरीरवांस्तानि कुर्यादशरीर: पराभवेत्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! यदि युद्ध आदि में राग-द्वेष के कारण निन्दित कर्म हुए हों, तो उन कर्मों के प्रायश्चित के लिए शास्त्रों में विधान है। जो अपने शरीर को सुरक्षित रखता है, वह पापों की निवृत्ति के लिए प्रायश्चित कर सकता है; किन्तु जिसका शरीर नहीं रहेगा, वह उन पापकर्मों के फलस्वरूप पराजय ही पाएगा, क्योंकि वह प्रायश्चित नहीं कर सकता। 24॥
 
Kuntinandan! If blasphemous deeds have been committed due to attachment and hatred during war etc., then there is a provision in the scriptures for atonement for those deeds. One who keeps his body safe can atone for the remission of sins; But the one whose body will no longer remain will only suffer defeat as a result of those sinful deeds because he cannot atone. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)