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mahabharat 12.32.23: हे राजन! हे भरतपुत्र! यदि किसी का धर्म दोषपूर्ण भी हो, तो भी उसमें दृढ़ रहने वाले आप जैसे धर्मात्मा राजा के लिए शरीर त्यागना उचित नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 12.32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.32.23 
स्वधर्मे वर्तमानस्य सापवादेऽपि भारत।
एवमात्मपरित्यागस्तव राजन् न शोभन:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! हे भरतपुत्र! यदि किसी का धर्म दोषपूर्ण भी हो, तो भी उसमें दृढ़ रहने वाले आप जैसे धर्मात्मा राजा के लिए शरीर त्यागना उचित नहीं है।
 
O King! O son of Bharata! Even if one's Dharma is flawed, it is not appropriate for a righteous king like you, who remains steadfast in it, to give up his body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)