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mahabharat 12.32.21-22: भरत! हे राजनश्रेष्ठ! यदि आप कहते हैं कि इतना सब स्वीकार करने पर भी संसार में कर्मों की पुनरावृत्ति होती रहती है, लोग कर्म करते हैं और उनके शुभ-अशुभ फल भोगते हैं, ऐसा मेरा मत है; तो इसके उत्तर में मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इस अवस्था में भी उस पापकर्म का त्याग कर दें, जिसका फल अशुभ कर्म होता है। अपने मन को शोक में न डुबोएँ। ॥21-22॥   |   mahabharat अध्याय 12.32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  12.32.21-22 
तथापि लोके कर्माणि समावर्तन्ति भारत।
शुभाशुभफलं चैते प्राप्नुवन्तीति मे मति:॥ २१॥
एवमप्यशुभं कर्म कर्मणस्तत्फलात्मकम्।
त्यज त्वं राजशार्दूल मैवं शोके मन: कृथा:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
भरत! हे राजनश्रेष्ठ! यदि आप कहते हैं कि इतना सब स्वीकार करने पर भी संसार में कर्मों की पुनरावृत्ति होती रहती है, लोग कर्म करते हैं और उनके शुभ-अशुभ फल भोगते हैं, ऐसा मेरा मत है; तो इसके उत्तर में मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इस अवस्था में भी उस पापकर्म का त्याग कर दें, जिसका फल अशुभ कर्म होता है। अपने मन को शोक में न डुबोएँ। ॥21-22॥
 
Bharata! O best of kings! If you say that even after accepting all this, the recurrence of karmas still happens in the world, people do karmas and reap their good and bad results, this is my opinion; then in answer to this I request you to give up that sinful karma even in this condition, which results in bad karma. Do not drown your mind in sorrow. ॥ 21-22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)