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mahabharat 12.32.16: परंतु हे कुन्तीपुत्र! यह वांछनीय नहीं है कि दूसरे के किए हुए कर्मों का फल दूसरे को मिले (शस्त्र काटने वाले का अपराध शस्त्र बनाने वाले पर आरोपित हो); इसलिए तू सभी शुभ-अशुभ कर्मों का कर्म और फल सर्वप्रेरक परमेश्वर को सौंप दे॥ 16॥   |   mahabharat अध्याय 12.32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 32: व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.32.16 
न चैतदिष्टं कौन्तेय यदन्येन कृतं फलम्।
प्राप्नुयादिति यस्माच्च ईश्वरे तन्निवेशय॥ १६॥
 
 
अनुवाद
परंतु हे कुन्तीपुत्र! यह वांछनीय नहीं है कि दूसरे के किए हुए कर्मों का फल दूसरे को मिले (शस्त्र काटने वाले का अपराध शस्त्र बनाने वाले पर आरोपित हो); इसलिए तू सभी शुभ-अशुभ कर्मों का कर्म और फल सर्वप्रेरक परमेश्वर को सौंप दे॥ 16॥
 
But, O son of Kunti, it is not desirable that the fruit of the deeds done by another should be reaped by another (the crime of the one who cuts the weapon should be imposed on the one who makes the weapon); therefore, assign the action and fruit of all good and bad deeds to the all-inspiring God.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)