श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 319: जरा-मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पञ्चशिख और राजा जनकका संवाद  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  12.319.9-10 
नैवास्य कश्चिद् भवति नासौ भवति कस्यचित्॥ ९॥
पथि सङ्गतमेवेदं दारैरन्यैश्च बन्धुभि:।
नायमत्यन्तसंवासो लब्धपूर्वो हि केनचित्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
यहाँ इस जीव का अपना कोई नहीं है और वह भी किसी का अपना नहीं है। यहाँ पत्नी और अन्य मित्रों का साथ तो वैसे ही मिलता है जैसे राह चलते मुसाफिर मिलते हैं, पर यहाँ किसी ने कभी किसी के साथ दीर्घकालीन संगति का सुख नहीं भोगा।
 
Here this living being has no one of his own and he too is no one's own. Here one gets along with his wife and other friends just like travellers meet on the road, but here no one has ever enjoyed the happiness of long-term companionship with anyone.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)