Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.98-100: राजेन्द्र! नरेश्वर! सम्पूर्ण सांख्य, ज्ञान और योगशास्त्र का स्वाध्याय करके उन्होंने स्वाभाविक धर्म और अधर्म का त्याग कर दिया और यह निश्चय किया कि ‘मैं नित्य हूँ।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, सत्य-असत्य, जन्म-मरण को व्यक्त (बुद्धि आदि) और अव्यक्त (प्रकृति) का कार्य मानकर, सब कुछ प्राकृत (स्वाभाविक और असत्य) मानकर, प्रकृति के संसर्ग से रहित होकर केवल अपने शुद्ध और नित्य स्वरूप का ही चिंतन प्रारंभ किया।। 98-100॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सांख्यज्ञानमधीयानो योगशास्त्रं च कृत्स्नश:।
धर्माधर्मं च राजेन्द्र प्राकृतं परिगर्हयन्॥ ९८॥
अनन्त इति कृत्वा स नित्यं केवलमेव च।
धर्माधर्मौ पुण्यपापे सत्यासत्ये तथैव च॥ ९९॥
जन्ममृत्यू च राजेन्द्र प्राकृतं तदचिन्तयत्।
व्यक्ताव्यक्तस्य कर्मेदमिति नित्यं नराधिप॥ १००॥
अनुवाद
राजेन्द्र! नरेश्वर! सम्पूर्ण सांख्य, ज्ञान और योगशास्त्र का स्वाध्याय करके उन्होंने स्वाभाविक धर्म और अधर्म का त्याग कर दिया और यह निश्चय किया कि ‘मैं नित्य हूँ।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, सत्य-असत्य, जन्म-मरण को व्यक्त (बुद्धि आदि) और अव्यक्त (प्रकृति) का कार्य मानकर, सब कुछ प्राकृत (स्वाभाविक और असत्य) मानकर, प्रकृति के संसर्ग से रहित होकर केवल अपने शुद्ध और नित्य स्वरूप का ही चिंतन प्रारंभ किया।। 98-100॥
Rajendra! Nareshwar! After self-studying the entire Sankhya, knowledge and Yoga Shastra, he renounced the natural religion and unrighteousness and decided that 'I am eternal.' Having made this decision, he considered religion-unrighteousness, virtue-sin, truth-false, birth and death as the work of the manifest (intellect etc.) and the unmanifest (nature), considering everything as Prakrit (natural and false) and contemplated only on his pure and eternal form, free from contact with nature. Started. 98-100॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥