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mahabharat 12.318.95-96: उन्होंने आदरपूर्वक ऋषि की परिक्रमा की और उन्हें विदा किया। ऋषि याज्ञवल्क्य के चले जाने पर मोक्ष को जानने वाले देवरात के पुत्र राजा जनक ने वहीं बैठकर एक करोड़ गौओं का स्पर्श करके उन्हें ब्राह्मणों को दान कर दिया और प्रत्येक ब्राह्मण को मुट्ठी भर रत्न और स्वर्ण दिया।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 95-96
 
 
श्लोक  12.318.95-96 
गते मुनिवरे तस्मिन् कृते चापि प्रदक्षिणम्।
दैवरातिर्नरपतिरासीनस्तत्र मोक्षवित्॥ ९५॥
गोकोटिं स्पर्शयामास हिरण्यं तु तथैव च।
रत्नाञ्जलिमथैकं च ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने आदरपूर्वक ऋषि की परिक्रमा की और उन्हें विदा किया। ऋषि याज्ञवल्क्य के चले जाने पर मोक्ष को जानने वाले देवरात के पुत्र राजा जनक ने वहीं बैठकर एक करोड़ गौओं का स्पर्श करके उन्हें ब्राह्मणों को दान कर दिया और प्रत्येक ब्राह्मण को मुट्ठी भर रत्न और स्वर्ण दिया।
 
He respectfully circumambulated the sage and bid him farewell. When the sage Yagyavalkya left, King Janaka, the son of Devarat, who knew salvation, sat there and touched one crore cows and donated them to the Brahmins and gave each Brahmin an handful of gems and gold.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)