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mahabharat 12.318.94: भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! जब बुद्धिमान याज्ञवल्क्य ने उन्हें ऐसा उपदेश दिया, तो उस समय मिथिला के राजा जनक बहुत प्रसन्न हुए।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  12.318.94 
भीष्म उवाच
स एवमनुशास्तस्तु याज्ञवल्क्येन धीमता।
प्रीतिमानभवद् राजा मिथिलाधिपतिस्तदा॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! जब बुद्धिमान याज्ञवल्क्य ने उन्हें ऐसा उपदेश दिया, तो उस समय मिथिला के राजा जनक बहुत प्रसन्न हुए।
 
Bhishma says - Yudhishthira! King Janaka of Mithila was very pleased at that time when the wise Yagyavalkya gave him such advice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)