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mahabharat 12.318.93: राजन! तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में मैंने तुम्हें सत्य ज्ञान का उपदेश दिया है; अतः अब तुम शोक से मुक्त होकर इस सत्य ज्ञान में निपुण हो जाओ। मैंने तुम्हें बहुत अच्छी तरह से ज्ञान का उपदेश दिया है। जाओ, तुम्हारा सदैव कल्याण हो॥ 93॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  12.318.93 
यत् ते पृष्टं तन्मया चोपदिष्टं
याथातथ्यं तद्विशोको भवस्व।
राजन् गच्छस्वैतदर्थस्य पारं
सम्यक् प्रोक्तं स्वस्ति ते त्वस्तु नित्यम्॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
राजन! तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में मैंने तुम्हें सत्य ज्ञान का उपदेश दिया है; अतः अब तुम शोक से मुक्त होकर इस सत्य ज्ञान में निपुण हो जाओ। मैंने तुम्हें बहुत अच्छी तरह से ज्ञान का उपदेश दिया है। जाओ, तुम्हारा सदैव कल्याण हो॥ 93॥
 
King! In answer to your question, I have taught you the true knowledge; so now you should be free from sorrow and become proficient in this true knowledge. I have taught you knowledge very well. Go, may you always be blessed.॥ 93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)