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mahabharat 12.318.92: नरेन्द्र! अतः सब ओर से ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि सभी जातियों के लोग अपने-अपने आश्रमों में रहते हुए ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं; अतः ज्ञान में स्थित ब्राह्मण अथवा ज्ञान में तत्पर अन्य किसी भी जाति का व्यक्ति, सनातन मोक्ष प्राप्त करने वाला बताया गया है।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  12.318.92 
तस्माज्ज्ञानं सर्वतो मार्गितव्यं
सर्वत्रस्थं चैतदुक्तं मया ते।
तत्स्थो ब्रह्मा तस्थिवांश्चापरो य-
स्तस्मै नित्यं मोक्षमाहुर्नरेन्द्र॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
नरेन्द्र! अतः सब ओर से ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि सभी जातियों के लोग अपने-अपने आश्रमों में रहते हुए ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं; अतः ज्ञान में स्थित ब्राह्मण अथवा ज्ञान में तत्पर अन्य किसी भी जाति का व्यक्ति, सनातन मोक्ष प्राप्त करने वाला बताया गया है।
 
Narendra! Therefore, one should try to acquire knowledge from all sides. I have already told you that people of all castes can acquire knowledge only while living in their respective ashrams; therefore, a Brahmin who is established in knowledge or a person of any other caste who is devoted to knowledge, has been told to attain eternal salvation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)