Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.88: चाहे ज्ञान ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा निम्न कुल में उत्पन्न किसी मनुष्य से भी प्राप्त हो, तो भी धर्मात्मा पुरुष को उसे प्राप्त करके सदैव उस पर श्रद्धा रखनी चाहिए। जिसके भीतर श्रद्धा है, उसमें जन्म-मरण प्रवेश नहीं कर सकता। 88॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
प्राप्य ज्ञानं ब्राह्मणात् क्षत्रियाद् वा
वैश्याच्छूद्रादपि नीचादभीक्ष्णम्।
श्रद्धातव्यं श्रद्दधानेन नित्यं
न श्रद्धिनं जन्ममृत्यू विशेताम्॥ ८८॥
अनुवाद
चाहे ज्ञान ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा निम्न कुल में उत्पन्न किसी मनुष्य से भी प्राप्त हो, तो भी धर्मात्मा पुरुष को उसे प्राप्त करके सदैव उस पर श्रद्धा रखनी चाहिए। जिसके भीतर श्रद्धा है, उसमें जन्म-मरण प्रवेश नहीं कर सकता। 88॥
Even if knowledge is received from a Brahmin, Kshatriya, Vaishya, Shudra or a man born in a low caste, a devout person should always have faith in him after receiving it. Birth and death cannot enter a person who has faith within him. 88॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥