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mahabharat 12.318.86: यह उपदेश उन सब को, जो सांख्य में पूर्णतया पारंगत हैं, सांख्यधर्म में तत्पर हैं, योगधर्म में तत्पर योगी हैं तथा मोक्ष की कामना रखने वाले अन्य सब लोगों को ज्ञान का प्रत्यक्ष फल देने वाला है ॥ 86॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  12.318.86 
सांख्या: सर्वे सांख्यधर्मे रताश्च
तद्वद् योगा योगधर्मे रताश्च।
ये चाप्यन्ये मोक्षकामा मनुष्या-
स्तेषामेतद् दर्शनं ज्ञानदृष्टम्॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
यह उपदेश उन सब को, जो सांख्य में पूर्णतया पारंगत हैं, सांख्यधर्म में तत्पर हैं, योगधर्म में तत्पर योगी हैं तथा मोक्ष की कामना रखने वाले अन्य सब लोगों को ज्ञान का प्रत्यक्ष फल देने वाला है ॥ 86॥
 
This teaching will give the direct fruit of knowledge to all those who are fully versed in Sankhya, those who are devoted to the Dharma of Sankhya, those who are yogis devoted to the Dharma of Yoga, and to all other people who aspire for salvation. ॥ 86॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)