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mahabharat 12.318.85: राजा जनक! ब्रह्मा आदि देवता जो आकाश में विचरण करते हैं, पृथ्वी पर निवास करने वाले मनुष्य तथा पृथ्वी के नीचे के लोकों में रहने वाले जो लोग कल्याणकारी मोक्षमार्ग का आश्रय ले रहे थे, उन-उन स्थानों पर जाकर विश्वावसु ने उन सबको मेरे द्वारा कहे हुए इस सम्यक् दर्शन का उपदेश किया ॥85॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  12.318.85 
ब्रह्मादीनां खेचराणां क्षितौ च
ये चाधस्तात् संवसन्ते नरेन्द्र।
तत्रैव तद्दर्शनं दर्शयन् वै
सम्यक् क्षेम्यं ये पथं संश्रिता वै॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
राजा जनक! ब्रह्मा आदि देवता जो आकाश में विचरण करते हैं, पृथ्वी पर निवास करने वाले मनुष्य तथा पृथ्वी के नीचे के लोकों में रहने वाले जो लोग कल्याणकारी मोक्षमार्ग का आश्रय ले रहे थे, उन-उन स्थानों पर जाकर विश्वावसु ने उन सबको मेरे द्वारा कहे हुए इस सम्यक् दर्शन का उपदेश किया ॥85॥
 
King Janak! The gods like Brahma who roam in the sky, the human beings who reside on the earth and those who live in the worlds below the earth, among them those who were taking shelter of the path of auspicious salvation, Vishwavasu went to those places and preached this right philosophy told by me to all of them. 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)