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mahabharat 12.318.84: याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - राजन ! ऐसा कहकर महान् गन्धर्वराज विश्वावसु अपनी तेजस्वी दृष्टि से प्रकाशित होकर मेरी परिक्रमा करके मुझे नमस्कार करके स्वर्गलोक को चले गए। उस समय मैं भी उन्हें बड़े संतोष से देख रहा था ॥84॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  12.318.84 
याज्ञवल्क्य उवाच
एवमुक्त्वा सम्प्रयातो दिवं स
विभ्राजन् वै श्रीमता दर्शनेन।
दृष्टश्च तुष्टॺा परयाभिनन्द्य
प्रदक्षिणं मम कृत्वा महात्मा॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - राजन ! ऐसा कहकर महान् गन्धर्वराज विश्वावसु अपनी तेजस्वी दृष्टि से प्रकाशित होकर मेरी परिक्रमा करके मुझे नमस्कार करके स्वर्गलोक को चले गए। उस समय मैं भी उन्हें बड़े संतोष से देख रहा था ॥84॥
 
Yajnavalkyaji says – King! Saying this, the great Gandharvaraj Vishwavasu, illuminated with his radiant vision, circumambulated and greeted me and went to heaven. At that time I too looked at him with great satisfaction. 84॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)