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mahabharat 12.318.81: हे पापरहित गन्धर्वराज! इस प्रकार मैंने श्रुति के अनुसार जड़ प्रकृति, चेतन आत्मा और बुद्धिरूप परमात्मा का तुमसे वर्णन किया है ॥81॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  12.318.81 
एवमप्रतिबुद्धश्च बुध्यमानश्च तेऽनघ।
बुद्धश्चोक्तो यथातत्त्वं मया श्रुतिनिदर्शनात्॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
हे पापरहित गन्धर्वराज! इस प्रकार मैंने श्रुति के अनुसार जड़ प्रकृति, चेतन आत्मा और बुद्धिरूप परमात्मा का तुमसे वर्णन किया है ॥81॥
 
Sinless Gandharvaraj! In this way, I have described to you the inanimate nature, the animate soul and the Supreme Soul in the form of the intellect as per the Shruti. 81॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)