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mahabharat 12.318.78: राजन! ईश्वर अलग है और आत्मा अलग है; क्योंकि ईश्वर आत्मा का आश्रय है; किन्तु ज्ञानी संत-महात्मा दोनों को एक ही देखते और समझते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  12.318.78 
अन्यश्च राजन्नवरस्तथान्य: पञ्चविंशक:।
तत्स्थानाच्चानुपश्यन्ति एक एवेति साधव:॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
राजन! ईश्वर अलग है और आत्मा अलग है; क्योंकि ईश्वर आत्मा का आश्रय है; किन्तु ज्ञानी संत-महात्मा दोनों को एक ही देखते और समझते हैं।
 
Rajan! God is different and soul is different; Because God is the shelter of the soul; But knowledgeable saints and mahatmas see and understand both of them as the same.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)