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mahabharat 12.318.77: जब द्विज यह समझ लेता है कि मैं कोई और हूं तथा यह प्राकृतिक शरीर या जड़ जगत मुझसे सर्वथा भिन्न है, तब वह प्रकृति के संपर्क से मुक्त हो जाता है और छब्बीसवें तत्व, ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  12.318.77 
यदा तु मन्यतेऽन्योऽहमन्य एष इति द्विज:।
तदा स केवलीभूत: षड्‍‍‍विंशमनुपश्यति॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
जब द्विज यह समझ लेता है कि मैं कोई और हूं तथा यह प्राकृतिक शरीर या जड़ जगत मुझसे सर्वथा भिन्न है, तब वह प्रकृति के संपर्क से मुक्त हो जाता है और छब्बीसवें तत्व, ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है।
 
When a Dwija understands that I am someone else and this natural body or the inanimate world is completely different from me, then he is free from contact with nature and realizes the twenty-sixth element, God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)