Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.75-76: जैसे मछली जल में रहते हुए भी उस जल को अपने से भिन्न समझती है, वैसे ही यह जीवात्मा भी प्राकृतिक शरीर में रहते हुए भी अपने को प्रकृति से भिन्न समझता है। तथापि, जब यह शरीर के प्रति ममता, साहचर्य और अभिमान के कारण परमात्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव नहीं करता, तब कालसागर में डूब जाता है। किन्तु जब यह समतायुक्त होकर अपने और परमात्मा की एकता को समझ लेता है, तब कालसागर से बच जाता है। ॥75-76॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यथैव बुध्यते मत्स्यस्तथैषोऽप्यनुबुध्यते।
स स्नेहात् सहवासाच्च साभिमानाच्च नित्यश:॥ ७५॥
स निमज्जति कालस्य यदैकत्वं न बुध्यते।
उन्मज्जति हि कालस्य समत्वेनाभिसंवृत:॥ ७६॥
अनुवाद
जैसे मछली जल में रहते हुए भी उस जल को अपने से भिन्न समझती है, वैसे ही यह जीवात्मा भी प्राकृतिक शरीर में रहते हुए भी अपने को प्रकृति से भिन्न समझता है। तथापि, जब यह शरीर के प्रति ममता, साहचर्य और अभिमान के कारण परमात्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव नहीं करता, तब कालसागर में डूब जाता है। किन्तु जब यह समतायुक्त होकर अपने और परमात्मा की एकता को समझ लेता है, तब कालसागर से बच जाता है। ॥75-76॥
Just as a fish, despite living in water, considers that water to be different from itself, similarly this soul, despite living in the natural body, considers itself to be different from nature. However, when it does not feel its unity with God due to affection, companionship and pride towards the body, it drowns in the ocean of time. But when it, endowed with equanimity of mind, understands the unity of itself and God, then it is saved from that ocean of time. ॥ 75-76॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥