Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.74: तत्त्वज्ञ पुरुषों को चाहिए कि वे प्रकृति को आत्म-चेतना से स्वीकार न करें। जैसे मछली जल का अनुसरण करती है, परन्तु अपने को उससे पृथक् समझती है, वैसे ही मनुष्य को भी अपनी प्रवृत्ति के अनुसार चलना चाहिए; परन्तु प्रकृति को अपना स्वरूप न समझें। 74॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न चतुर्विंशको ग्राह्यो मनुजैर्ज्ञानदर्शिभि:।
मत्स्यश्चोदकमन्वेति प्रवर्तेत प्रवर्तनात्॥ ७४॥
अनुवाद
तत्त्वज्ञ पुरुषों को चाहिए कि वे प्रकृति को आत्म-चेतना से स्वीकार न करें। जैसे मछली जल का अनुसरण करती है, परन्तु अपने को उससे पृथक् समझती है, वैसे ही मनुष्य को भी अपनी प्रवृत्ति के अनुसार चलना चाहिए; परन्तु प्रकृति को अपना स्वरूप न समझें। 74॥
Philosophical people should not accept nature with self-consciousness. Just as a fish follows the water, but considers itself separate from it, in the same way man himself should move according to its tendencies; But do not consider nature as your form. 74॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥