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mahabharat 12.318.70: गन्धर्व! प्रकृति जड़ है, अतः पच्चीसवाँ तत्त्व - आत्मा - उसे जानता है; परन्तु प्रकृति आत्मा को नहीं जानती॥70॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  12.318.70 
अबुध्यमानां प्रकृतिं बुध्यते पञ्चविंशक:।
न तु बुध्यति गन्धर्व प्रकृति: पञ्चविंशकम्॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
गन्धर्व! प्रकृति जड़ है, अतः पच्चीसवाँ तत्त्व - आत्मा - उसे जानता है; परन्तु प्रकृति आत्मा को नहीं जानती॥70॥
 
Gandharva! Nature is inanimate, hence the twenty-fifth element – ​​the soul – knows it; But nature does not know the soul. 70॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)