Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.59-62h: इस विषय का प्रतिपादन मैं पहले मुनिवर जैगीषव्य, असित, देवल, ब्रह्मर्षि पराशर, बुद्धिमान वार्षगण्य, भृगु, पंचशिख, कपिल, शुक, गौतम, अर्ष्टिषेण, महात्मा गर्ग, नारद, आसुरि, बुद्धिमान पुलस्त्य, सनत्कुमार, महात्मा शुक्र और अपने पिता कश्यपजी के मुख से सुन चुका था। 59—61 1/2॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इस विषय का प्रतिपादन मैं पहले मुनिवर जैगीषव्य, असित, देवल, ब्रह्मर्षि पराशर, बुद्धिमान वार्षगण्य, भृगु, पंचशिख, कपिल, शुक, गौतम, अर्ष्टिषेण, महात्मा गर्ग, नारद, आसुरि, बुद्धिमान पुलस्त्य, सनत्कुमार, महात्मा शुक्र और अपने पिता कश्यपजी के मुख से सुन चुका था। 59—61 1/2॥
I had heard the presentation of this subject before from the mouth of Munivar Jaigishavya, Asit, Deval, Brahmarshi Parashar, intelligent Varshganya, Bhrigu, Panchsikh, Kapil, Shuka, Gautam, Arshtishen, Mahatma Garg, Narad, Asuri, intelligent Pulastya, Sanatkumar, Mahatma Shukra and my father Kashyapji. 59—61 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥