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mahabharat 12.318.58: विश्वावसु बोले - ब्राह्मण शिरोमणे ! जब आपने आत्मा के पच्चीसवें तत्व रूप को परमात्मा से अभिन्न बताया है, तब यह संदेह उत्पन्न होता है कि क्या वास्तव में आत्मा परमात्मा से अभिन्न है भी या नहीं ? अतः कृपया इसका स्पष्ट वर्णन कीजिए ॥58॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  12.318.58 
विश्वावसुरुवाच
पञ्चविंशं यदेतत् ते प्रोक्तं ब्राह्मणसत्तम।
तथा तन्न तथा चेति तद् भवान् वक्तुमर्हति॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
विश्वावसु बोले - ब्राह्मण शिरोमणे ! जब आपने आत्मा के पच्चीसवें तत्व रूप को परमात्मा से अभिन्न बताया है, तब यह संदेह उत्पन्न होता है कि क्या वास्तव में आत्मा परमात्मा से अभिन्न है भी या नहीं ? अतः कृपया इसका स्पष्ट वर्णन कीजिए ॥58॥
 
Vishwavasu said – Brahmin Shiromane! When you have described the twenty-fifth elemental form of the soul as being inseparable from the Supreme Soul, a doubt arises as to whether the soul is actually inseparable from the Supreme Soul or not? Therefore, please describe this clearly. 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)