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mahabharat 12.318.57: जो सांख्य के विद्वान् और योगीजन जन्म-मृत्यु के भय से रहित होकर परमपद को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं, वे आत्मा और परमात्मा को एक-दूसरे से भिन्न नहीं मानते। वे भी उपर्युक्त दर्शन या संतों के मत की प्रशंसा करते हैं, जो आत्मा और परमेश्वर में अभेद दर्शाता है॥ 57॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.318.57 
ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम्।
जन्ममृत्युभयाद् योगा: सांख्याश्च परमैषिण:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
जो सांख्य के विद्वान् और योगीजन जन्म-मृत्यु के भय से रहित होकर परमपद को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं, वे आत्मा और परमात्मा को एक-दूसरे से भिन्न नहीं मानते। वे भी उपर्युक्त दर्शन या संतों के मत की प्रशंसा करते हैं, जो आत्मा और परमेश्वर में अभेद दर्शाता है॥ 57॥
 
Those scholars of Sankhya and Yogis who desire to attain the ultimate state without the fear of birth and death do not consider the soul and the Supreme Soul to be different from each other. They also praise the above mentioned philosophy or the opinion of the saints which shows the non-difference between the soul and the Supreme Lord.॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)