Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.55: हे कश्यपपुत्र! जब कोई भक्त प्रतिदिन भगवान के स्वरूप का चिन्तन और ध्यान करने लगता है, तब वह प्रकृति के संसर्ग से मुक्त होकर छब्बीसवें तत्त्वस्वरूप परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ॥ 55॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यदानुपश्यतेऽत्यन्तमहन्यहनि काश्यप।
तदा स केवलीभूत: षड्विंशमनुपश्यति॥ ५५॥
अनुवाद
हे कश्यपपुत्र! जब कोई भक्त प्रतिदिन भगवान के स्वरूप का चिन्तन और ध्यान करने लगता है, तब वह प्रकृति के संसर्ग से मुक्त होकर छब्बीसवें तत्त्वस्वरूप परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ॥ 55॥
O son of Kashyapan! When a devotee starts thinking and meditating upon the nature of God daily, then he becomes free from the contact of nature and attains the Supreme Being in the form of the twenty-sixth element. ॥ 55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥