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mahabharat 12.318.54: इस संसार में जन्म-मरण का चक्र निरन्तर चलता रहता है, ऐसा समझकर मनुष्य को वैदिक कर्मों में वर्णित समस्त कर्मों और उनके फलों को नाशवान जानकर उनका त्याग कर देना चाहिए और यहाँ अविनाशी धर्म का आश्रय लेना चाहिए ॥ 54॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.318.54 
अजस्रं जन्मनिधनं चिन्तयित्वा त्रयीमिमाम्।
परित्यज्य क्षयमिह अक्षयं धर्ममास्थित:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में जन्म-मरण का चक्र निरन्तर चलता रहता है, ऐसा समझकर मनुष्य को वैदिक कर्मों में वर्णित समस्त कर्मों और उनके फलों को नाशवान जानकर उनका त्याग कर देना चाहिए और यहाँ अविनाशी धर्म का आश्रय लेना चाहिए ॥ 54॥
 
Considering that the cycle of birth and death continues unabated in this world, man should abandon all the actions and their results mentioned in the Vedic rituals, knowing them to be destructible, and take shelter of the imperishable Dharma here. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)