Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.53: मनुष्य को सदैव सतर्क रहना चाहिए और अपनी अंतरात्मा के द्वारा प्रकृति और पुरुष दोनों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। जिससे उसे बार-बार जन्म-मरण के चक्र में न पड़ना पड़े ॥53॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
द्रष्टव्यौ नित्यमेवैतौ तत्परेणान्तरात्मना।
तथास्य जन्मनिधने न भवेतां पुन: पुन:॥ ५३॥
अनुवाद
मनुष्य को सदैव सतर्क रहना चाहिए और अपनी अंतरात्मा के द्वारा प्रकृति और पुरुष दोनों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। जिससे उसे बार-बार जन्म-मरण के चक्र में न पड़ना पड़े ॥53॥
Man should always be alert and should acquire knowledge of both nature and man through his inner soul. So that he does not have to fall into the cycle of birth and death again and again. ॥ 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥