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mahabharat 12.318.48: विश्ववसो! मनुष्य को अनुसंधान सहित वेदों के ज्ञान रूपी धन को अर्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए तथा नित्य कर्म में संलग्न रहना चाहिए। सभी वेद एकान्त स्वाध्याय और मनन के योग्य माने गए हैं। 48॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.318.48 
विद्योपेतं धनं कृत्वा कर्मणा नित्यकर्मणि।
एकान्तदर्शना वेदा: सर्वे विश्वावसो स्मृता:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
विश्ववसो! मनुष्य को अनुसंधान सहित वेदों के ज्ञान रूपी धन को अर्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए तथा नित्य कर्म में संलग्न रहना चाहिए। सभी वेद एकान्त स्वाध्याय और मनन के योग्य माने गए हैं। 48॥
 
Vishwavaso! One should strive to earn wealth in the form of knowledge of Vedas along with research and remain engaged in daily work. All Vedas are considered worthy of solitary self-study and meditation. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)