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mahabharat 12.318.43: जो प्रकृति सृष्टि और संहार का कारण है, उसे चल कहते हैं और जो सृष्टि और संहार का रचयिता है, उसे स्थावर पुरुष माना गया है ॥ 43॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.318.43 
चलां तु प्रकृतिं प्राहु: कारणं क्षयसर्गयो:।
आक्षेपसर्गयो: कर्ता निश्चल: पुरुष: स्मृत:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जो प्रकृति सृष्टि और संहार का कारण है, उसे चल कहते हैं और जो सृष्टि और संहार का रचयिता है, उसे स्थावर पुरुष माना गया है ॥ 43॥
 
Nature, which is the cause of creation and destruction, is called Chala, and the person who is the creator of creation and destruction is considered to be the immovable person. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)