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mahabharat 12.318.41: क, तप और आतप के विषय में जो प्रश्न उठाया गया है, उसका स्पष्टीकरण किया गया है। पुरुष को क कहा गया है। प्रकृति को ही तप कहा गया है और शुद्ध पुरुष को आतप कहा गया है ॥41॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.318.41 
कस्तपा अतपा: प्रोक्त: कोऽसौ पुरुष उच्यते।
तपास्तु प्रकृतिं प्राहुरतपा निष्कल: स्मृत:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
क, तप और आतप के विषय में जो प्रश्न उठाया गया है, उसका स्पष्टीकरण किया गया है। पुरुष को क कहा गया है। प्रकृति को ही तप कहा गया है और शुद्ध पुरुष को आतप कहा गया है ॥41॥
 
The question raised about Ka, Tapa and Atapa is explained. The Purusha is called Ka. The Prakriti itself is called Tapa and the immaculate Purusha is called Atapa. ॥41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)