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mahabharat 12.318.34: हे राजन! पिताश्री! उस समय मैंने उपनिषदों, उनके परिशिष्टों तथा उत्तम आन्विकी विद्या को देखा और मन से उन सबका मनन करने लगा।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.318.34 
तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव।
मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! पिताश्री! उस समय मैंने उपनिषदों, उनके परिशिष्टों तथा उत्तम आन्विकी विद्या को देखा और मन से उन सबका मनन करने लगा।
 
O King! Father! At that time I looked at the Upanishads, their appendixes and the excellent Anviksiki Vidya and began to churn them all with my mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)