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mahabharat 12.318.31-32: महाराज! ये प्रश्न सुनकर मैंने गंधर्व शिरोमणि राजा विश्वावसु से कहा - 'हे राजन! आपने एक के बाद एक बहुत अच्छे प्रश्न पूछे हैं। आप अर्थ के विशेषज्ञ हैं। कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, तब तक मैं आपके इन प्रश्नों पर विचार करूँगा।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर गंधर्व राजा चुपचाप बैठ गए।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  12.318.31-32 
अथोक्तश्च महाराज राजा गन्धर्वसत्तम:।
पृष्टवाननुपूर्वेण प्रश्नमर्थविदुत्तमम्॥ ३१॥
मुहूर्तमुष्यतां तावद् यावदेवं विचिन्तये।
बाढमित्येव कृत्वा च तूष्णीं गन्धर्व आस्थित:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! ये प्रश्न सुनकर मैंने गंधर्व शिरोमणि राजा विश्वावसु से कहा - 'हे राजन! आपने एक के बाद एक बहुत अच्छे प्रश्न पूछे हैं। आप अर्थ के विशेषज्ञ हैं। कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, तब तक मैं आपके इन प्रश्नों पर विचार करूँगा।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर गंधर्व राजा चुपचाप बैठ गए।
 
Maharaj! On hearing these questions I said to the Gandharva Shiromani King Vishwavasu - 'O King! You have asked very good questions one after the other. You are an expert in meaning. Please wait for a while, till then I will think over these questions of yours.' Then saying 'Very good' the Gandharva King sat quietly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)