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mahabharat 12.318.21: हे पापरहित राजा! इस प्रकार मैंने सूर्यदेव से शुक्लयजुर्वेद की पंद्रह शाखाएँ प्राप्त कीं। इसी प्रकार रोमहर्षण सूत से मैंने पुराणों का अध्ययन किया। 21॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.318.21 
दश पञ्च च प्राप्तानि यजूंष्यर्कान्मयानघ।
तथैव रोमहर्षेण पुराणमवधारितम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे पापरहित राजा! इस प्रकार मैंने सूर्यदेव से शुक्लयजुर्वेद की पंद्रह शाखाएँ प्राप्त कीं। इसी प्रकार रोमहर्षण सूत से मैंने पुराणों का अध्ययन किया। 21॥
 
Sinless king! In this way I received fifteen branches of Shuklayajurveda from the Sun God. Similarly, I studied the Puranas from Romharshan Suta. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)