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mahabharat 12.318.19: उस समय मेरे मामाजी के वेदों की दक्षिणा के लिए विशेष आग्रह करने पर मैंने महर्षि देवल के समक्ष आधी दक्षिणा उन्हें दे दी और आधी स्वयं ले ली॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.318.19 
मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्धं हृतवानहम्।
स्ववेददक्षिणायार्थे विमर्दे मातुलेन ह॥ १९॥
 
 
अनुवाद
उस समय मेरे मामाजी के वेदों की दक्षिणा के लिए विशेष आग्रह करने पर मैंने महर्षि देवल के समक्ष आधी दक्षिणा उन्हें दे दी और आधी स्वयं ले ली॥19॥
 
At that time, on special insistence of my maternal uncle for the dakshina for my Vedas, I gave half the dakshina to him in front of Maharshi Deval and took the other half myself.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)