Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.17-18: महाराज! तत्पश्चात् मैंने अपने सौ श्रेष्ठ शिष्यों को शतपथ का अध्ययन कराया। तत्पश्चात् मैंने अपने महामनस्वी मामा (जिन्होंने पहले मेरा तिरस्कार किया था) को अप्रसन्न करने के लिए उनके शिष्यों सहित आपके पिता महात्मा राजा जनक का यज्ञ सम्पन्न किया, जो अपनी किरणों से चमकते सूर्य के समान शिष्यों से सुशोभित थे। 17-18॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
महाराज! तत्पश्चात् मैंने अपने सौ श्रेष्ठ शिष्यों को शतपथ का अध्ययन कराया। तत्पश्चात् मैंने अपने महामनस्वी मामा (जिन्होंने पहले मेरा तिरस्कार किया था) को अप्रसन्न करने के लिए उनके शिष्यों सहित आपके पिता महात्मा राजा जनक का यज्ञ सम्पन्न किया, जो अपनी किरणों से चमकते सूर्य के समान शिष्यों से सुशोभित थे। 17-18॥
Maharaj! Thereafter, I made my hundred best disciples study Shatapatha. After this, in order to displease my great-minded maternal uncle (who had earlier despised me) along with his disciples, I performed the yagya of your father Mahatma Raja Janak, adorned with his disciples like the sun shining with its rays. 17-18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥