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mahabharat 12.318.14: उनका स्मरण करते ही स्वर और व्यंजनों से सुशोभित मंगलमयी देवी सरस्वती ॐकार को अपने सामने धारण किए हुए मेरे सामने प्रकट हो गईं ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.318.14 
तत: प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता।
ओङ्कारमादित: कृत्वा मम देवी सरस्वती॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उनका स्मरण करते ही स्वर और व्यंजनों से सुशोभित मंगलमयी देवी सरस्वती ॐकार को अपने सामने धारण किए हुए मेरे सामने प्रकट हो गईं ॥14॥
 
As soon as I remembered Her, the auspicious Goddess Saraswati, adorned with vowels and consonants, appeared before me holding the OMkar in front of her. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)