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mahabharat 12.318.13: मैंने सूर्यदेव के वचन सुने, फिर उनके चले जाने पर घर आकर आनन्दपूर्वक सरस्वती का चिंतन किया॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.318.13 
ततोऽनुव्याहृतं श्रुत्वा गते देवे विभावसौ।
गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तयं वै सरस्वतीम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मैंने सूर्यदेव के वचन सुने, फिर उनके चले जाने पर घर आकर आनन्दपूर्वक सरस्वती का चिंतन किया॥13॥
 
I heard the words of the Sun God. Then when he left, I came home and happily contemplated on Saraswati. ॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)