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mahabharat 12.318.112: पूर्वकाल में महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा जनक को जो उपनिषद (ज्ञान) सिखाया था, उसका ध्यान करके मनुष्य पूर्वोक्त सनातन, अविनाशी, शुभ, अमर और शोकरहित परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ॥112॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  12.318.112 
यदुपनिषदमुपाकरोत् तथासौ
जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्य:।
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त-
च्छुभममृतत्वमशोकमर्च्छति॥ ११२॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा जनक को जो उपनिषद (ज्ञान) सिखाया था, उसका ध्यान करके मनुष्य पूर्वोक्त सनातन, अविनाशी, शुभ, अमर और शोकरहित परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ॥112॥
 
By meditating upon the Upanishads (knowledge) which the sage Yagyavalkya had taught to King Janaka in the past, a man attains the aforementioned eternal, indestructible, auspicious, immortal and sorrow-free Supreme Brahma, the Supreme Being. ॥ 112॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादसमाप्तौ अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य-जनक-संवादकी समाप्तिविषयक तीन सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)