Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.318.109: युधिष्ठिर! यह ज्ञान मुझे पूर्वकाल में राजा जनक से प्राप्त हुआ था और जनक को याज्ञवल्क्य से प्राप्त हुआ था। ज्ञान ही सर्वोत्तम साधन है। कोई भी यज्ञ इसकी बराबरी नहीं कर सकता। केवल ज्ञान से ही मनुष्य इस दुर्गम संसार सागर को पार कर सकता है, यज्ञ से नहीं॥109॥ | mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एतन्मयाऽऽप्तं जनकात् पुरस्तात्
तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात्।
ज्ञानं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा
ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञै:॥ १०९॥
अनुवाद
युधिष्ठिर! यह ज्ञान मुझे पूर्वकाल में राजा जनक से प्राप्त हुआ था और जनक को याज्ञवल्क्य से प्राप्त हुआ था। ज्ञान ही सर्वोत्तम साधन है। कोई भी यज्ञ इसकी बराबरी नहीं कर सकता। केवल ज्ञान से ही मनुष्य इस दुर्गम संसार सागर को पार कर सकता है, यज्ञ से नहीं॥109॥
Yudhishthira! I had received this knowledge from King Janaka in the past and Janaka had received it from Yagyavalkya. Knowledge is the best means. No sacrifice can match it. Only with knowledge can a man cross this inaccessible ocean of the world; not with sacrifices.॥109॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥