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mahabharat 12.318.104: युधिष्ठिर! केवल भगवान् ही हमारे हैं। उनसे अधिक हमारे निकट और कौन हो सकता है? ऐसा तुम्हें सदैव मानना ​​चाहिए और इसके विपरीत कभी कुछ भी नहीं सोचना चाहिए॥104॥   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  12.318.104 
आत्मा ह्येवात्मनो ह्येक: कोऽन्यस्तस्मात्परो भवेत्।
एवं मन्यस्व सततमन्यथा मा विचिन्तय॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! केवल भगवान् ही हमारे हैं। उनसे अधिक हमारे निकट और कौन हो सकता है? ऐसा तुम्हें सदैव मानना ​​चाहिए और इसके विपरीत कभी कुछ भी नहीं सोचना चाहिए॥104॥
 
Yudhishthira! Only God is ours. Who else can be closer to us than Him? You should always believe this and never think of anything contrary to this.॥ 104॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)