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mahabharat 12.318.1: याज्ञवल्क्य कहते हैं- हे प्रभु नरेश्वर! आपने मुझसे अव्यक्त में स्थित परब्रह्म के विषय में जो प्रश्न पूछा है, वह अत्यन्त गहन है। उसे ध्यानपूर्वक सुनिए।   |   mahabharat अध्याय 12.318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 318: याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फलमुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.318.1 
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्थं परं यत् तत् पृष्टस्तेऽहं नराधिप।
परं गुह्यमिमं प्रश्नं शृणुष्वावहितो नृप॥ १॥
 
 
अनुवाद
याज्ञवल्क्य कहते हैं- हे प्रभु नरेश्वर! आपने मुझसे अव्यक्त में स्थित परब्रह्म के विषय में जो प्रश्न पूछा है, वह अत्यन्त गहन है। उसे ध्यानपूर्वक सुनिए।
 
Yagyavalkya says- Lord Nareshwar! The question you have asked me about the Supreme Brahman present in the unmanifested is very deep. Listen to it carefully.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)