vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 316: योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति
»
श्लोक 4
श्लोक
12.316.4
यदेव योगा: पश्यन्ति तत् सांख्यैरपि दृश्यते।
एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स तत्त्ववित्॥ ४॥
अनुवाद
योगी जिस सत्य को अनुभव करता है, वही सांख्य भी देखता है; अतः जो सांख्य और योग को एक ही देखता है, वही सत्य का ज्ञाता है। ॥4॥
The truth which the Yogi realises is also seen by the Sankhyas; hence, the one who sees Sankhya and Yoga as one, is the knower of truth. ॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×